चंद्रशेखर आजाद का बलिदान दिवस: पढ़ें जीवनी, क्रांतिकारी इतिहास. अंतिम संघर्ष का विस्तृत विश्लेषण
चंद्रशेखर आजाद का बलिदान दिवस भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रेरक अध्यायों में से एक है। 27 फरवरी 1931 को मात्र 24 वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए सदा के लिए ‘आजाद’ होने का संकल्प पूरा किया। यह जीवनी उनके अदम्य साहस, क्रांतिकारी योजनाओं और अंतिम बलिदान की गाथा का विस्तार से वर्णन करती है।
Overview
वह क्रांतिकारी जो मरते दम तक रहे ‘आजाद’
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अमर बलिदानी चंद्रशेखर आजाद वीरता और संकल्प की वह मिसाल हैं जिन्होंने ठान लिया था कि वह कभी अंग्रेजों के हाथों जिंदा नहीं पकड़े जाएंगे। उनके जीवन का हर क्षण आजादी के लिए समर्पित था और उन्होंने अपने नाम की तरह ‘आजाद’ रहने की कसम को आखिरी सांस तक निभाया । उनकी कहानी आज भी हर देशभक्त के दिल में जोश भर देती है।
प्रारंभिक जीवन और परिवार (1906-1921)
चंद्रशेखर आजाद का जन्म और बचपन
चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को वर्तमान मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा गांव में हुआ था । उनका पूरा नाम चंद्रशेखर तिवारी था। उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था । बचपन में ही उन्होंने आदिवासियों के बीच रहकर धनुष-बाण चलाना सीखा और निशानेबाजी में निपुण हो गए थे।
शिक्षा और बनारस प्रवास
माता चंद्रशेखर आजाद को संस्कृत शिक्षक बनाना चाहती थीं, जिसके चलते उनके पिता ने उन्हें काशी (बनारस) भेज दिया जहां वे एक संस्कृत स्कूल में पढ़ने लगे । यह वही समय था जब देश में असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था और बनारस की राजनीतिक हलचल ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया ।
कैसे बने ‘आजाद’? (1921)
असहयोग आंदोलन में भागीदारी और पहली गिरफ्तारी
महज़ 14-15 साल की उम्र में चंद्रशेखर गांधी जी से प्रभावित होकर असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। वे शराब की दुकानों पर धरना देने और प्रदर्शनों में हिस्सा लेने लगे। 20 दिसंबर 1921 को वे गिरफ्तार कर लिए गए और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए गए ।
ऐतिहासिक बयान: नाम ‘आजाद’, पिता ‘स्वतंत्रता’, पता ‘जेल’
जब जज ने उनका नाम पूछा, तो युवा चंद्रशेखर आजाद ने साहसिक उत्तर दिया: “मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता है और मेरा पता जेल है” । इस निडर जवाब से नाराज जज ने उन्हें 15 कोड़ों की सजा सुनाई। हर कोड़े के प्रहार पर वे वंदे मातरम का नारा लगाते रहे । इसी घटना के बाद से वे चंद्रशेखर ‘आजाद’ के नाम से विख्यात हुए और उन्होंने प्रण लिया कि वे कभी अंग्रेजों द्वारा जिंदा नहीं पकड़े जाएंगे ।
क्रांतिकारी पथ पर: गांधी से बिस्मिल तक (1922-1924)
असहयोग आंदोलन वापसी से मोहभंग
1922 में चौरी चौरा कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, तो आजाद सहित कई युवा निराश हुए। उन्हें लगा कि अहिंसा के मार्ग से स्वराज्य प्राप्ति दूर की कल्पना है ।
राम प्रसाद बिस्मिल से मुलाकात और क्रांतिकारी संगठन से जुड़ाव
इसी दौरान उनकी मुलाकात युवा क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्ता से हुई, जिन्होंने उनका परिचय राम प्रसाद बिस्मिल से करवाया । बिस्मिल के नेतृत्व में वे हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन (HRA) के सक्रिय सदस्य बन गए ।
प्रमुख क्रांतिकारी गतिविधियाँ (1925-1931)

काकोरी कांड (1925)
9 अगस्त 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और अन्य क्रांतिकारियों के साथ चंद्रशेखर आजाद ने लखनऊ के पास काकोरी में चलती ट्रेन को रोककर सरकारी खजाना लूटने की योजना को अंजाम दिया । इस घटना ने अंग्रेजी हुकूमत को हिला कर रख दिया। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं और बिस्मिल सहित कई क्रांतिकारियों को फांसी हुई, लेकिन आजाद अंग्रेजों के हाथ नहीं आए और वे फरार हो गए ।
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का गठन
फांसी और गिरफ्तारियों के बाद चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और अन्य साथियों के साथ मिलकर HRA का पुनर्गठन किया और 1928 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य समाजवादी आधार पर स्वतंत्र भारत का निर्माण था । आजाद संगठन के कमांडर-इन-चीफ बने और ‘बलराज’ नाम से पर्चे जारी करते थे।
सांडर्स हत्याकांड और लाहौर षड्यंत्र (1928)
लाला लाजपत राय की साइमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शन में हुई लाठीचार्ज से हुई मौत का बदला लेने के लिए आजाद और भगत सिंह ने योजना बनाई। 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह और राजगुरु ने लाहौर में पुलिस अधिकारी जे.पी. सांडर्स को गोली मारी, जबकि आजाद ने भागने में उनका कवर किया और एक पुलिस कांस्टेबल को गोली मारी जो उनका पीछा कर रहा था।
अंतिम संघर्ष और बलिदान (27 फरवरी 1931)
मुखबिरी और अल्फ्रेड पार्क में घेराव
27 फरवरी 1931 को आजाद अपने साथी सुखदेवराज के साथ इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में मिलने वाले थे। एक मुखबिर की सूचना पर सीआईडी अधिकारी नॉट-बॉवर और डीएसपी विश्वेश्वर सिंह भारी पुलिस बल के साथ पार्क पहुंच गए।
मुठभेड़
पुलिस को देखते ही आजाद ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। उन्होंने पहली ही गोली से नॉट-बॉवर के कंधे में मारी और विश्वेश्वर सिंह के जबड़े में गोली लगी । उन्होंने अपने साथी सुखदेवराज से कहा कि वह वहां से निकल जाए क्योंकि उनकी जांघ में गोली लग चुकी थी । आजाद ने अकेले ही पुलिस का डटकर मुकाबला किया।
‘आजाद’ रहने का संकल्प: खुद को मारी गोली
करीब 20 मिनट तक चली इस मुठभेड़ में जब उनकी पिस्तौल में सिर्फ एक गोली बची और पुलिस ने पार्क को चारों ओर से घेर लिया, तो उन्होंने अपने प्रण को निभाते हुए वह आखिरी गोली खुद को मार ली और अंग्रेजों को अपने शव पर कब्जा करने दिया, पर जिंदा नहीं ।
विरासत और प्रतीक
अल्फ्रेड पार्क का नामकरण और स्मारक
जिस पार्क में आजाद ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, उसे अब चंद्रशेखर आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है। उस ऐतिहासिक जामुन के पेड़ के पास एक स्मारक बना है, जिसकी ओट में लेकर उन्होंने अंतिम लड़ाई लड़ी थी।
पेड़ को कटवाने का अंग्रेजों का प्रयास
आजाद की मृत्यु के बाद लोग उस पेड़ के पास श्रद्धांजलि देने लगे और उस पर ‘आजाद’ लिखने लगे। अंग्रेज अधिकारियों को यह इतना खटका कि उन्होंने डर के मारे उस पेड़ को रातों-रात कटवा कर ही दिया ताकि वह क्रांति का प्रतीक न बन सके । बाद में वहां एक नया पेड़ लगाया गया।
विरासत और प्रतीक
अल्फ्रेड पार्क का नामकरण और स्मारक
जिस पार्क में आजाद ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, उसे अब चंद्रशेखर आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है। उस ऐतिहासिक जामुन के पेड़ के पास एक स्मारक बना है, जिसकी ओट में लेकर उन्होंने अंतिम लड़ाई लड़ी थी।
पेड़ को कटवाने का अंग्रेजों का प्रयास
आजाद की मृत्यु के बाद लोग उस पेड़ के पास श्रद्धांजलि देने लगे और उस पर ‘आजाद’ लिखने लगे। अंग्रेज अधिकारियों को यह इतना खटका कि उन्होंने डर के मारे उस पेड़ को रातों-रात कटवा कर ही दिया ताकि वह क्रांति का प्रतीक न बन सके । बाद में वहां एक नया पेड़ लगाया गया।
चंद्रशेखर आजाद सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उस अमर शौर्य का प्रतीक हैं जिसके लिए ‘दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे’ का नारा आज भी उतनी ही जीवंतता के साथ गूंजता है। उन्होंने साबित कर दिया कि शारीरिक रूप से शहीद होकर भी एक विचार और एक सपना कभी मरता नहीं।

BRIJESH MAURYA The Hind Manch के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। उन्हें कंटेंट राइटिंग में 8 वर्षों का अनुभव है। लखनऊ, उत्तर प्रदेश के निवासी बृजेश सामाजिक और समसामयिक विषयों पर तथ्यपूर्ण एवं निष्पक्ष लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्हें यात्रा करना और किताबें पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।