जानें क्या दो भागों में बट रहा सनातन धर्म? आशुतोष पांडेय बनाम अविमुक्तेश्वरानंद का विवाद!
एक ऐसा विवाद जिसने सनातन को दो खेमों में बांट दिया
इन दिनों सनातन धर्म एक गंभीर आंतरिक संकट से गुजर रहा है। एक तरफ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हैं, जो ज्योतिष पीठ के प्रमुख के रूप में हिंदू धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरुओं में से एक हैं, तो दूसरी तरफ आशुतोष पांडेय (ब्रह्मचारी) हैं, जो श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन जैसे संघर्षों के चेहरे के रूप में जाने जाते हैं । आशुतोष पांडेय द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य पर लगाए गए यौन शोषण के गंभीर आरोपों और उसके बाद आए पलटवार ने सनातन समाज को दो भागों में विभाजित कर दिया है। यह स्थिति धर्म के लिए एक बहुत खराब संकेत है और इस पर गहन ध्यान देने की आवशार्यकता है। इस लेख में हम दोनों पक्षों के तर्कों और घटनाक्रमों की विस्तृत रिपोर्ट पेश करके इस विवाद की तह तक जाने का प्रयास करेंगे।
पहला पक्ष: आशुतोष पांडेय का आरोप और न्यायिक प्रक्रिया
यौन शोषण का आरोप और कोर्ट का आदेश

विवाद की शुरुआत तब हुई जब शाकुंभरी पीठाधीश्वर आशुतोष ब्रह्मचारी ने प्रयागराज की एक विशेष अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर में नाबालिग शिष्यों के साथ यौन शोषण हुआ । आशुतोष पांडेय ने दावा किया कि इस मामले से जुड़ी एक सीडी भी उनके पास है । 21 फरवरी 2026 को एडीजे पॉक्सो कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य मुकुंदानंद गिरी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया । कोर्ट के इस आदेश के बाद आशुतोष पांडेय ने इसे न्याय की जीत बताते हुए प्रयागराज से वाराणसी तक पैदल सनातन यात्रा निकालने की घोषणा की, ताकि लोगों के सामने “सच्चाई” लाई जा सके ।
आशुतोष पर पलटवार: “साजिश” का आरोप
जहां एक तरफ आशुतोष पांडेय न्यायालय के आदेश से उत्साहित थे, वहीं दूसरी तरफ एक नए घटनाक्रम ने उनके खिलाफ सवाल खड़े कर दिए। शाहजहांपुर के एक युवक ने स्वयं वाराणसी पहुंचकर मीडिया के सामने दावा किया कि आशुतोष पांडेय ने उसे फोन पर कहा था कि वह “शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर अपनी बेटियों के साथ गलत काम करने का आरोप लगा दे।” । इस युवक ने बताया कि उसे सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था, लेकिन उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया और सच्चाई बताने के लिए वह शंकराचार्य के पास पहुंचा ।
दूसरा पक्ष: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बचाव और ‘षड्यंत्र’ का सिद्धांत
आरोपों का खंडन और ‘फर्जी मुकदमा’ की बात

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने शुरू से ही इन आरोपों को “फर्जी” और “साजिश” करार दिया है । कोर्ट में FIR दर्ज होने के बाद भी उन्होंने कहा कि सच्चाई जल्द सामने आ जाएगी और वे कानूनी लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आरोप लगाने वाला व्यक्ति “हिस्ट्रीशीटर” है और दूसरे संतों से जुड़ा हुआ है । उनका कहना था कि अगर माघ मेले में कोई घटना हुई होती तो वह प्रशासन के सीसीटीवी कैमरों में कैद हो जाती । शाहजहांपुर के युवक के बयान के बाद उन्होंने कहा कि अब उन्हें लगता है कि उनके खिलाफ “बड़ी साजिश” हो रही है और लोगों को लालच देकर झूठे केस में फंसाने की कोशिश की जा रही है ।
धार्मिक जगत में समर्थन और बढ़ता गुट
शंकराचार्य के समर्थन में भी कई स्वर उठे हैं। श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश फलाहारी ने आशुतोष पांडेय पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें “सनातन धर्म के नाम पर कलंक” बताया और यहां तक कि उनकी नाक काटकर लाने वाले को 21 लाख रुपए इनाम देने की घोषणा कर दी । यह घटना बताती है कि यह विवाद कितना उग्र रूप ले चुका है और दोनों पक्षों के अपने-अपने कट्टर समर्थक हैं।
क्या होगा आगे का रास्ता
सनातन के दो भाग मैं बंटना : एक खतरनाक संकेत
प्रस्तुत तथ्य बताते हैं कि यह महज एक आपराधिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सनातन धर्म की दिशा और नेतृत्व को लेकर छिड़ा एक बड़ा युद्ध बन गया है। एक ओर जहां आशुतोष पांडेय का पक्ष पारदर्शिता और न्याय की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष इसे सनातन परंपरा और गुरु पद की गरिमा पर सीधा हमला मान रहा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर यह विवाद दो खेमों में बंटकर बेहद जहरीला हो गया है। शाहजहांपुर के युवक का बयान इस केस की दिशा बदल सकता है, लेकिन इसने धार्मिक समुदाय में पहले से मौजूद दरार को और गहरा कर दिया है ।
न्यायालय ही नहीं, जनता की अदालत भी है
इस मामले की सुनवाई अदालत में जारी है। न्यायालय का फैसला जो भी हो, लेकिन इस विवाद ने जनता के मन में कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। क्या धर्मगुरुओं के खिलाफ इस तरह के आरोपों की जांच पारदर्शी तरीके से हो सकेगी? क्या सनातन समाज, न्यायालय के फैसले को स्वीकार करने के लिए तैयार है? या फिर यह मामला धार्मिक राजनीति का एक औज़ार बनकर रह जाएगा? फिलहाल तो यही लगता है कि जब तक ठोस सबूत सामने नहीं आ जाते, तब तक सनातन धर्म दो हिस्सों में बंटा रहेगा, और यह विभाजन किसी भी धर्म के लिए सबसे खराब संकेत है।
यह विवाद नहीं हमारे लिए आत्म चिंतन का समय?
यह पूरा घटनाक्रम सनातन धर्म के लिए आत्मचिंतन का समय है। यह धर्म के भीतर जवाबदेही और सुधार की आवश्यकता बनाम परंपरा और आस्था की रक्षा की बहस को जन्म देता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ेगी और जो भी दोषी होगा, वह सजा पाएगा। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण है कि इस विवाद के बाद सनातन समाज एकजुट होने का रास्ता खोजे, न कि आपसी कटुता में बिखर जाए।
आप इस विषय पर क्या राय रखते हैं कमेंट का जरूर बताएं।

BRIJESH MAURYA The Hind Manch के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। उन्हें कंटेंट राइटिंग में 8 वर्षों का अनुभव है। लखनऊ, उत्तर प्रदेश के निवासी बृजेश सामाजिक और समसामयिक विषयों पर तथ्यपूर्ण एवं निष्पक्ष लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्हें यात्रा करना और किताबें पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।