ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद अली खामनेई की हत्या!
आयतुल्लाह सैयद अली खामनेई: ईरान के सर्वोच्च नेता का जीवन परिचय, शासन और 2026 तक का इतिहास
आयतुल्लाह सैयद अली खामनेई (Ayatollah Sayyed Ali Khamenei), ईरान के दूसरे सर्वोच्च नेता थे, जिन्होंने 1989 से लेकर फरवरी 2026 में अपनी मृत्यु तक देश पर शासन किया . वह आधुनिक मध्य पूर्व के सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद नेताओं में से एक थे। उनका जीवन ईरानी क्रांति, इराक-ईरान युद्ध, परमाणु वार्ता और क्षेत्रीय शक्ति संघर्ष सहित कई महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह रहा है . यह लेख उनके जीवन के शुरुआती दिनों से लेकर उनके निधन तक के सभी प्रमुख घटनाक्रमों का विस्तार से वर्णन करता है।
आयतुल्लाह अली खामनेई की प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
आयतुल्लाह सैयद अली खामनेई का जन्म 19 अप्रैल, 1939 को ईरान के पूर्वोत्तर शहर मशहद में हुआ था . वह एक धार्मिक परिवार में आठ भाई-बहनों में दूसरे स्थान पर थे . उनके पिता, सैयद جوद हुसैनी खामनेई, एक मध्यम स्तर के शिया धर्मगुरु थे . खामनेई ने अपने बचपन को “गरीब लेकिन धार्मिक” बताया है, अक्सर वह केवल “रोटी और किशमिश” खाकर गुजारा करते थे
धार्मिक शिक्षा और प्रारंभिक प्रभाव
खामनेई ने मात्र चार वर्ष की आयु में ही कुरान की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी . उन्होंने मशहद में ही अपनी प्रारंभिक धार्मिक शिक्षा प्राप्त की और 11 वर्ष की उम्र तक वह एक धार्मिक पद प्राप्त करने के योग्य हो गए थे .
- उच्च शिक्षा: 18 वर्ष की आयु में, वह इराक के नजफ में स्थित शिया सेमिनरी चले गए, लेकिन अपने पिता के आग्रह पर एक वर्ष बाद ही वापस ईरान लौट आए और क़ुम शहर में अपनी धार्मिक शिक्षा जारी रखी . यहीं पर उनकी मुलाकात आयतुल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी से हुई, जो बाद में उनके राजनीतिक गुरु बने और जिनके विचारों ने उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया
ईरानी क्रांति में भूमिका और शाह के विरुद्ध संघर्ष
शाह विरोधी गतिविधियाँ
1960 के दशक की शुरुआत में, खामनेई आयतुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व वाले उस आंदोलन से जुड़ गए, जो ईरान के शाह, मोहम्मद रजा पहलवी के शासन का विरोध कर रहा था . वे एक प्रभावशाली वक्ता थे और उन्होंने शाह के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित करने और भूमिगत गतिविधियों में भाग लिया .
- गिरफ्तारियाँ और यातनाएँ: इस दौरान, वह शाह की गुप्त पुलिस सावाक द्वारा कई बार (कम से कम छह बार) गिरफ्तार किए गए और उन्हें यातनाएँ दी गईं। उन्हें कुछ समय के लिए देश के आंतरिक हिस्सों में निर्वासित भी किया गया .
1979 की इस्लामी क्रांति की सफलता
1979 में ईरानी क्रांति की सफलता और शाह के शासन के पतन के बाद, खुमैनी स्वदेश लौट आए और ईरान के इस्लामी गणराज्य की स्थापना की . खामनेई, जो खुमैनी के विश्वासपात्र बन चुके थे, नई राजनीतिक व्यवस्था में तेजी से उभरे . उन्हें क्रांतिकारी परिषद का सदस्य नियुक्त किया गया और बाद में वह उप रक्षा मंत्री और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे
राष्ट्रपति काल और इराक-ईरान युद्ध
हत्या का प्रयास (1981)

जून 1981 में, खामनेई एक हत्या के प्रयास में बाल-बाल बच गए। तेहरान की एक मस्जिद में भाषण देते समय एक टेप रिकॉर्डर में छिपा बम विस्फोट हुआ, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गए . इस हमले में उनके दाहिने हाथ की स्थायी रूप से कार्य क्षमता समाप्त हो गई और उनके फेफड़ों व वोकल कॉर्ड्स को भी नुकसान पहुंचा
ईरान के राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल (1981-1989)
उसी वर्ष अगस्त में तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद अली रजाई की हत्या के बाद, अक्टूबर 1981 में खामनेई ईरान के राष्ट्रपति चुने गए . उन्होंने यह पद 1989 तक संभाला .
- युद्धकालीन नेता: उनका राष्ट्रपति काल इराक-ईरान युद्ध (1980-1988) के दौरान रहा। वह अक्सर युद्ध के मोर्चे पर जाते थे और सैन्य कमांडरों के संपर्क में रहते थे . इस युद्ध ने पश्चिम और विशेष रूप से अमेरिका के प्रति उनके गहरे अविश्वास को और मजबूत किया, क्योंकि पश्चिमी देशों ने सद्दाम हुसैन का समर्थन किया था .
- युद्धविराम का समर्थन: 1988 में, खामनेई ने आयतुल्लाह खुमैनी को युद्धविराम स्वीकार करने की सलाह दी, जो एक साहसिक कदम था, लेकिन अंततः खुमैनी ने इसे मान लिया
सर्वोच्च नेता के रूप में उदय और सत्ता का केंद्रीकरण
खुमैनी के उत्तराधिकारी के रूप में चयन (1989)
जून 1989 में आयतुल्लाह खुमैनी का निधन हो गया . खुमैनी की मृत्यु के अगले ही दिन, विशेषज्ञों की सभा (असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स) ने अली खामनेई को ईरान का नया सर्वोच्च नेता चुन लिया . यह चुनाव कुछ हद तक आश्चर्यजनक था क्योंकि उस समय खामनेई के पास सर्वोच्च नेता बनने के लिए आवश्यक उच्च धार्मिक पद (मरजा ए तकलीद) नहीं था .
- संवैधानिक संशोधन: इस बाधा को दूर करने के लिए संविधान में संशोधन किया गया, जिससे एक ऐसा धार्मिक नेता सर्वोच्च नेता बन सके जो “इस्लामी विद्वता” का प्रदर्शन करता हो। इसके बाद खामनेई को आयतुल्लाह का पद दिया गया
सत्ता का सुदृढ़ीकरण
शुरुआत में कई लोग उन्हें एक समझौतावादी उम्मीदवार मानते थे, लेकिन खामनेई ने धीरे-धीरे अपनी शक्ति को मजबूत किया . उन्होंने सरकार के सभी क्षेत्रों – संसद, न्यायपालिका, मीडिया और सशस्त्र बलों – में अपने वफादारों का एक व्यापक नेटवर्क तैयार किया .
- इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के साथ संबंध: उन्होंने IRGC के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किए, जो न केवल देश की सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति बनी, बल्कि एक प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक ताकत भी बन गई . बदले में, IRGC ने घरेलू अशांति को दबाने और क्षेत्र में ईरान के प्रभाव का विस्तार करने में उनकी मदद की
घरेलू नीति और विरोध प्रदर्शन
विभिन्न सरकारों के साथ संबंध
खामनेई ने सुधारवादी और रूढ़िवादी दोनों तरह के राष्ट्रपतियों के साथ काम किया, लेकिन अंतिम अधिकार हमेशा उनके पास रहा .
- हाशमी रफसंजानी (1989-1997): उनके आर्थिक एजेंडे का समर्थन किया .
- मोहम्मद खातमी (1997-2005): उनके सुधारवादी एजेंडे और पश्चिम के साथ संबंध सुधारने के प्रयासों में बाधा डाली .
- महमूद अहमदीनेजाद (2005-2013): 2009 के विवादास्पद चुनाव के बाद उनका समर्थन किया, लेकिन बाद में जब अहमदीनेजाद ने उनकी शक्ति को चुनौती दी तो उन्हें कमजोर कर दिया .
- हसन रूहानी (2013-2021): परमाणु वार्ता को मंजूरी दी, लेकिन सुधारों के प्रयासों को अवरुद्ध किया .
- इब्राहिम रईसी (2021-2024): उनकी नीतियों के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे
विरोध प्रदर्शनों का दमन
खामनेई के शासनकाल में कई बार बड़े पैमाने पर जन-विरोध प्रदर्शन हुए, जिन्हें बेहद क्रूरता से कुचला गया:
- 1999 का छात्र विरोध प्रदर्शन: दबा दिया गया .
- 2009 का ग्रीन मूवमेंट: अहमदीनेजाद के पुन: चुनाव में धांधली के आरोपों के बाद हुए प्रदर्शनों को हिंसक रूप से कुचल दिया गया, जिसमें दर्जनों लोग मारे गए और हजारों गिरफ्तार हुए .
- 2019 का ईंधन मूल्य विरोध: कीमतों में वृद्धि के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान, खामनेई के आदेश पर कई दिनों के लिए इंटरनेट बंद कर दिया गया और सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए .
- 2022 का महसा अमीनी विरोध: 22 वर्षीय महसा अमीनी की हिजाब ठीक से न पहनने के आरोप में “मोरेलिटी पुलिस” की हिरासत में मृत्यु के बाद देशव्यापी विरोध प्रदर्शन भड़क उठे, जिन्हें “महिला, जीवन, स्वतंत्रता” आंदोलन के नाम से जाना गया। मानवाधिकार समूहों के अनुसार, सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 550 से अधिक प्रदर्शनकारी मारे गए और 20,000 हिरासत में लिए गए .
- 2025-2026 का विरोध प्रदर्शन: दिसंबर 2025 के अंत में आर्थिक स्थिति के खिलाफ शुरू हुए प्रदर्शनों ने सरकार-विरोधी रूप धारण कर लिया। खामनेई ने सबसे क्रूर दमन का आदेश दिया, जिसमें मानवाधिकार संगठनों के अनुसार 6,000 से अधिक प्रदर्शनकारी मारे गए
विदेश नीति और क्षेत्रीय प्रभाव
“प्रतिरोध की धुरी” (Axis of Resistance)
खामनेई की विदेश नीति का मुख्य स्तंभ अमेरिकी और इजरायली प्रभाव का विरोध करना था . उन्होंने इस उद्देश्य के लिए क्षेत्र में “प्रतिरोध की धुरी” का निर्माण किया, जो सरकार समर्थक समूहों और सशस्त्र संगठनों का एक नेटवर्क था .
- लेबनान में हिज़्बुल्लाह: उनका सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी और इजरायल के खिलाफ एक प्रमुख शक्ति .
- फिलिस्तीनी समूह (हमास): उन्हें सैन्य और वित्तीय सहायता प्रदान की .
- यमन में हूती विद्रोही और इराक व सीरिया में शिया मिलिशिया: ये सभी ईरान के समर्थन पर निर्भर थे
अमेरिका और इजरायल के साथ संबंध
खामनेई ने हमेशा अमेरिका को “महान शैतान” और इजरायल को एक अवैध राज्य करार दिया . उनके नेतृत्व में ईरान का इन दोनों देशों के साथ लगातार टकराव रहा।
- 2001 में 9/11 के हमलों के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने ईरान को “बुराई की धुरी” का हिस्सा बताया .
- इराक युद्ध (2003) के दौरान, खामनेई ने IRGC की कुद्स फोर्स के माध्यम से इराकी शिया मिलिशिया को समर्थन दिया, जिन्होंने अमेरिकी सैनिकों पर हमले किए .
- जनवरी 2020 में, अमेरिका ने बगदाद में एक ड्रोन हमले में IRGC के शीर्ष कमांडर कासिम सुलेमानी की हत्या कर दी, जो खामनेई के बेहद करीबी थे। खामनेई ने बदले की कसम खाई
परमाणु कार्यक्रम और अंतर्राष्ट्रीय वार्ता
ईरान का परमाणु कार्यक्रम खामनेई के शासनकाल की सबसे निर्णायक विदेश नीति चुनौतियों में से एक था।
- परमाणु फतवा: 2000 के दशक की शुरुआत में, खामनेई ने परमाणु हथियारों के विकास को इस्लाम के विरुद्ध बताते हुए प्रतिबंधित कर दिया था .
- संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA): 2015 में, उनके समर्थन से ईरान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों और जर्मनी के साथ एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता किया, जिसके तहत प्रतिबंधों में ढील के बदले ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित कर दिया .
- अमेरिका की वापसी (2018): 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया और फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई . इसके बाद खामनेई का अमेरिका के प्रति अविश्वास और गहरा गया .
- यूरेनियम संवर्धन: अमेरिका की वापसी के बाद, खामनेई के आदेश पर ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन स्तर को बढ़ाना शुरू कर दिया
अंतिम वर्ष और निधन (2025-2026)
2025 का इजरायल के साथ संक्षिप्त युद्ध

जून 2025 में, इजरायल और ईरान के बीच सीधा सैन्य टकराव हुआ। इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य ठिकानों पर हमले किए, जबकि ईरान ने इजरायली शहरों पर मिसाइल दागीं . जब अमेरिका ने भी हमले में हिस्सा लिया, तो युद्ध 12 दिनों तक चला, जिसके बाद ट्रम्प द्वारा थोपे गए युद्धविराम को सभी पक्षों ने स्वीकार कर लिया . इस युद्ध में ईरान के सहयोगी हिज़्बुल्लाह और हमास को भी भारी क्षति पहुंची और उनके कई शीर्ष नेता मारे गए, जिससे खामनेई की क्षेत्रीय रणनीति कमजोर हुई
2025-2026 के प्रदर्शन और अंतिम दमन
2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में ईरान में भीषण आर्थिक संकट के कारण फिर से बड़े पैमाने पर प्रदर्शन भड़क उठे . खामनेई ने इन प्रदर्शनों को दबाने का आदेश दिया, जिसे मानवाधिकार समूहों ने 1979 की क्रांति के बाद का सबसे क्रूर दमन बताया . हजारों प्रदर्शनकारी मारे गए और हिरासत में लिए गए
निधन (फरवरी 2026)
28 फरवरी, 2026 को, अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की कि इन हमलों के पहले दिन ही आयतुल्लाह अली खामनेई मारे गए, जिसकी पुष्टि बाद में ईरानी राज्य मीडिया ने भी कर दी .
- मृत्यु के समय आयु: 86 वर्ष .
- शासन की अवधि: 36 वर्षों तक सर्वोच्च नेता रहे .
- उत्तराधिकारी का प्रश्न: उनकी मृत्यु के बाद ईरान के लिए अनिश्चितता का एक नया दौर शुरू हो गया है। यह स्पष्ट नहीं है कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा और इसका ईरान की राजनीति, परमाणु नीति और क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या प्रभाव पड़ेगा . संभावित उत्तराधिकारियों में उनके बेटे मुज्तबा खामनेई सहित कुछ अन्य धार्मिक नेताओं के नाम मीडिया में चर्चा में रहे हैं
आयतुल्लाह अली खामनेई का जीवन ईरान और पूरे मध्य पूर्व के आधुनिक इतिहास का एक अभिन्न अंग था। एक धार्मिक विद्वान के बेटे से लेकर तीन दशकों से अधिक समय तक एक शक्तिशाली राष्ट्र के सर्वोच्च नेता बनने तक की उनकी यात्रा ने ईरान की पहचान को गहराई से आकार दिया। उनकी विरासत एक जटिल मिश्रण है – एक ओर वे उन लोगों के लिए एक सिद्धांतवादी नेता थे जो अमेरिकी और इजरायली प्रभाव का विरोध करते थे, वहीं दूसरी ओर, आलोचक उन्हें एक ऐसा नेता मानते हैं जिसने असहमति को कुचलने और अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए क्रूर बल का प्रयोग किया। उनके निधन के साथ ही ईरानी इतिहास का एक लंबा अध्याय समाप्त हुआ है, और देश अब एक अनिश्चित भविष्य की ओर देख रहा है

BRIJESH MAURYA The Hind Manch के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। उन्हें कंटेंट राइटिंग में 8 वर्षों का अनुभव है। लखनऊ, उत्तर प्रदेश के निवासी बृजेश सामाजिक और समसामयिक विषयों पर तथ्यपूर्ण एवं निष्पक्ष लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्हें यात्रा करना और किताबें पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।