पहलगाम हमले पर जो लोग चुप थे, आज खामनेई की मौत पर सड़कों पर उतर आए हैं।
पहलगाम से तेहरान तक: दोहरे मापदंड और हमारी सामूहिक संवेदना का सवाल
“संवेदना” शब्द सुनते ही मन में ममता, करुणा और इंसानियत की तस्वीर उभरती है। लेकिन क्या हो जब यह संवेदना भी चुनिंदा लोगों, चुनिंदा घटनाओं और चुनिंदा भूगोल के लिए ही सुरक्षित रह जाए? हाल ही में दो घटनाओं ने इस बहस को एक बार फिर हवा दी है। एक तरफ जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों के हमले ने मासूमों को मौत के घाट उतार दिया, लेकिन इस दर्द पर सन्नाटा पसरा रहा। वहीं दूसरी तरफ, ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत की खबर पर कुछ लोग सड़कों पर उतर आए।
होली का मौसम चल रहा है, रंगों और खुशियों का यह पर्व अक्सर सौहार्द की मिसाल पेश करता है। लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि इस मौके को भी नफरत फैलाने और सांप्रदायिक जहर उगलने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा हो? जब एक ही समाज के लोग एक त्रासदी पर चुप रहते हैं और दूसरी पर बेकाबू हो जाते हैं, तो यह सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि हमारी सोच का दोहरापन है। सवाल सिर्फ पहलगाम या खामेनेई का नहीं है, सवाल है हमारी संवेदनाओं की समानता का। सवाल है कि क्या हम आतंक और अन्याय के खिलाफ हर जगह एक जैसी आवाज उठा पा रहे हैं?
इस लेख में हम इसी उठते-बैठते मुद्दे पर बात करेंगे, समझेंगे कि आखिर क्यों चुनिंदा मुद्दों पर शोर और चुनिंदा मुद्दों पर चुप्पी हमारे सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा बन रही है।
क्या संवेदनाएँ भी सीमाओं में बंधी हैं?
किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी संवेदनशीलता और न्यायप्रियता से होती है। लेकिन हाल की घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी संवेदनाएँ भी भौगोलिक और वैचारिक सीमाओं में कैद हो गई हैं? एक ओर जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद जहाँ मृतकों के परिजनों के अलावा सन्नाटा पसरा रहा, वहीं ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के निधन पर कुछ वर्गों ने न सिर्फ शोर मचाया, बल्कि सड़कों पर उतरकर इसे जश्न मनाने का प्रयास किया। यह अंतर केवल दो अलग-अलग घटनाओं की प्रतिक्रिया का अंतर नहीं है, बल्कि यह हमारी सामूहिक चेतना और वैश्विक न्याय के प्रति हमारे दृष्टिकोण की विफलता को दर्शाता है।
होली के रंग और माहौल खराब करने की कोशिश
त्योहारों के दौरान सांप्रदायिक सौहार्द पर खतरा
होली का त्योहार भारतीय संस्कृति में आपसी भाईचारे और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। ऐसे समय में जब पूरा देश इस त्योहार की तैयारी में है, कुछ तत्व सांप्रदायिक रंग भरकर माहौल को खराब करने में लगे हैं। पहलगाम हमले पर चुप रहने वाले और खामेनेई की मौत पर प्रदर्शन करने वाले लोगों की मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित प्रयास लगता है कि होली के रंगों को खून के रंग में बदलकर हिंदू-मुस्लिम दंगे जैसे हालात पैदा किए जाएँ। ऐसी प्रवृत्तियाँ न केवत सांप्रदायिक सौहार्द के लिए खतरा हैं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी चिंता का विषय हैं।
आतंक हो या अन्याय — आवाज़ हर जगह उठनी चाहिए
यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि हमारा दृष्टिकोण किसी एक धर्म, देश या विचारधारा के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। सवाल निष्पक्षता और नैतिकता का है।
- पहलगाम हमला: जब भारत की धरती पर मासूम नागरिक आतंक का शिकार होते हैं, तो उस दर्द को महसूस करना और उसकी निंदा करना प्रत्येक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है। इस मामले में जो चुप्पी देखी गई, वह या तो आतंक के प्रति उदासीनता को दर्शाती है या फिर एक संकीर्ण राजनीतिक सोच को। आतंकवाद की कोई राष्ट्रीयता या धर्म नहीं होता, उसका विरोध सार्वभौमिक होना चाहिए।
- खामेनेई का निधन: किसी विदेशी नेता के निधन पर शोक या टिप्पणी करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है। लेकिन जब उस मौत को भारत के आंतरिक मामलों से जोड़कर देखा जाए, और उसे देश में अस्थिरता फैलाने या किसी समुदाय विशेष को उकसाने के बहाने के रूप में इस्तेमाल किया जाए, तो यह राष्ट्र-विरोधी गतिविधि की श्रेणी में आता है।
हमारा आग्रह है कि आतंक और अन्याय के खिलाफ आवाज़ हर जगह एक जैसी होनी चाहिए। चाहे वह पहलगाम हो, कश्मीर हो, या फिर गाजा। हम उन सभी मासूमों के साथ खड़े हैं, जो हिंसा का शिकार होते हैं, चाहे वह किसी भी देश, धर्म या जाति के हों।
एकजुटता की नई परिभाषा
यह घटनाक्रम हमें आत्ममंथन के लिए बाध्य करता है। हमें यह तय करना होगा कि हमारी संवेदनाओं का केंद्र क्या है। यदि हम अपने ही देश के दर्द से बेखबर हैं और दूसरे देशों की घटनाओं पर ज्यादा मुखर हैं, तो यह हमारी सोच का दोहरापन है, जो समाज को तोड़ने का काम करेगा।
आइए, होली के इस पवित्र अवसर पर हम एक नए संकल्प के साथ आगे बढ़ें:
- हर आतंकी घटना की एक समान और स्पष्ट निंदा करें, चाहे वह कहीं भी हो।
- सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने वाली हर गतिविधि का सामूहिक रूप से विरोध करें।
- नफरत की राजनीति को त्यागकर, मानवता और भाईचारे के रंगों को अपनाएँ।
सवाल सिर्फ पहलगाम या खामेनेई का नहीं है; सवाल उस सच्चाई का है जिसे हम स्वीकार करते हैं और उस भविष्य का जिसे हम आने वाली पीढ़ियों के लिए बनाना चाहते हैं। एक सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ हर अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठे, और हर मासूम की मौत पर आँसू बहें – बिना किसी भेदभाव के।

BRIJESH MAURYA The Hind Manch के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। उन्हें कंटेंट राइटिंग में 8 वर्षों का अनुभव है। लखनऊ, उत्तर प्रदेश के निवासी बृजेश सामाजिक और समसामयिक विषयों पर तथ्यपूर्ण एवं निष्पक्ष लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्हें यात्रा करना और किताबें पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।