सोहनलाल श्रीमाली के नेतृत्व में पिछड़ा वर्ग आयोग: जानें उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और भविष्य की राह –
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़ा वर्ग हमेशा से एक निर्णायक कारक रहा है। ऐसे में उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका और उसके निर्णय महज प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक-राजनीतिक दिशा तय करने वाले संकेत होते हैं। सोहनलाल श्रीमाली के उपाध्यक्ष पद पर बने रहने के साथ ही आयोग ने हाल के महीनों में जो निर्णय लिए हैं, वे इस दिशा में कई सवाल और संभावनाएं खड़ी करते हैं। यह लेख आयोग के अब तक के कार्यकाल, उपलब्धियों और आगे की चुनौतियों का विश्लेषण करता है।
एक जमीनी नेता की नियुक्ति: राजनीतिक संकेत और सामाजिक अपेक्षाएँ
जब अगस्त 2024 में सोहनलाल श्रीमाली को उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया, तो इसे महज एक प्रशासनिक फेरबदल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मिर्जापुर जैसे पिछड़े इलाके से आने वाले श्रीमाली की नियुक्ति भाजपा की ओबीसी वोट बैंक को साधने की लंबी रणनीति का हिस्सा है ।
उनके राजनीतिक सफर पर नजर डालें तो वे मझवां विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जता चुके थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें विधायक न बनाकर आयोग में उपाध्यक्ष पद की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी । यह इस बात का संकेत है कि संगठन उन्हें नीति निर्माण और सामाजिक न्याय के मंच पर अधिक प्रभावी मानता है। गोपीगंज में भव्य स्वागत और कार्यकर्ताओं में उत्साह यह दर्शाता है कि उनकी जमीनी पकड़ मजबूत है, जो किसी भी आयोग के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सबसे अहम शर्त होती है ।

आयोग के अब तक के निर्णय: सिफारिशों से ठोस परिणामों तक का सफर
पिछले एक साल में आयोग ने कई ऐतिहासिक सिफारिशें की हैं, जिन पर अमल होना अभी बाकी है। यहाँ आयोग की उपलब्धियों और उनकी वास्तविक स्थिति का विश्लेषण जरूरी है।
नए बोर्ड और आयोग: सांस्कृतिक संरक्षण या वोट बैंक की राजनीति?
नवंबर 2024 की बैठक में लिए गए केश कला बोर्ड और स्वर्ण कला आयोग के गठन के निर्णय दोहरे अर्थ रखते हैं । एक तरफ यह परंपरागत व्यवसायों से जुड़े समुदायों (नाई और सुनार) के आर्थिक हितों की रक्षा का प्रयास है, जो सराहनीय है। दूसरी तरफ, यह उन समुदायों को सीधे सरकारी योजनाओं से जोड़ने का एक राजनीतिक संदेश भी है। सवाल यह है कि क्या ये बोर्ड महज कागजी रहेंगे या इनके पास वास्तविक शक्तियाँ और बजट होगा? इन बोर्डों की स्थापना से जुड़ी विधेयकों की प्रगति पर नजर रखना जरूरी होगा।
आरक्षण की राजनीति: 27% की मांग और हकीकत
आयोग की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिशों में से एक सरकारी निर्माण कार्यों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण लागू करना है । यह मांग जितनी जायज है, उतनी ही जटिल भी। निर्माण कार्यों में ठेकेदारी और कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े इस आरक्षण को लागू करने के लिए संवैधानिक संशोधनों और नियमावली में बदलाव की जरूरत होगी। अगर यह सिफारिश मूर्त रूप लेती है, तो यह उत्तर प्रदेश में ओबीसी समुदाय के लिए आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम होगा।
वहीं, पुलिस थाना प्रभारियों की नियुक्तियों में आरक्षण की सिफारिश पुलिस प्रशासन में ओबीसी समुदाय के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह लंबे समय से चली आ रही उस धारणा को तोड़ने में मददगार हो सकती है कि पुलिस का ऊपरी ढांचा सिर्फ कुछ खास वर्गों के हाथों में है।
सामाजिक न्याय: जातीय सर्वेक्षण और नई जातियों को शामिल करने की मांग
खंगार और गोरखा समुदाय को ओबीसी सूची में शामिल करने की सिफारिश और क्रीमी लेयर की सीमा बढ़ाने पर विचार – ये सभी मांगें सामाजिक न्याय के मूल सवाल से जुड़ी हैं। लेकिन सबसे बड़ा और विवादास्पद मुद्दा है जातीय सर्वेक्षण। बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में भी इसकी मांग जोर पकड़ रही है। आयोग का नया समर्पित आयोग गठित कर त्वरित सर्वेक्षण कराने का फैसला इस दिशा में पहला कदम है। लेकिन यह सर्वेक्षण कितना वैज्ञानिक होगा? क्या यह सिर्फ पंचायत चुनावों के लिए एक अस्थायी व्यवस्था है या फिर यह एक व्यापक जातीय जनगणना की नींव रखेगा? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब आने वाले समय में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
हालिया निर्णय और उनकी प्रासंगिकता (जुलाई 2025)
हाल ही में जुलाई 2025 के अंत में हुई आयोग की बैठक में कई अहम फैसले लिए गए हैं जो आयोग की सक्रियता को दर्शाते हैं ।
सहकारी समितियों में आरक्षण: एक ऐतिहासिक फैसला
सबसे अहम निर्णय सहकारी समितियों के संचालक मंडलों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण लागू करना है । यह फैसला सहकारी अधिनियम की धारा 29(5) और निर्वाचन नियमावली के नियम 28 के तहत लिया गया है। गन्ना समितियों, सहकारी बैंकों और दुग्ध समितियों जैसी संस्थाओं में यह आरक्षण ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण रखने वाले ओबीसी वर्ग के प्रभाव को और मजबूत करेगा। यह फैसला संगठनात्मक चुनावों में भी बड़ा बदलाव ला सकता है और पिछड़े वर्ग के नेतृत्व को नए अवसर दे सकता है।
देवांशी जाति का मुद्दा और केंद्र से टकराव
आयोग ने देवांशी जाति को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने की सिफारिश राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से करने का फैसला लिया है । यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राज्य और केंद्र के बीच के अधिकार क्षेत्र की जटिलता को उजागर करता है। जब तक केंद्रीय सूची में शामिल नहीं किया जाता, देवांशी समुदाय केंद्रीय संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं उठा सकता। इस फैसले से यह सवाल उठता है कि राज्य आयोग केंद्र सरकार पर अपनी सिफारिशें मनवाने के लिए कितना दबाव बना सकता है।
OBC प्रमाणपत्रों की वैधता: एक लंबित मुद्दा
बैठक में ओबीसी प्रमाणपत्रों की वैधता और जारी करने की प्रक्रिया में आ रही समस्याओं पर चिंता जताई गई । यह एक ऐसा तकनीकी मुद्दा है जो सबसे ज्यादा आम आदमी को प्रभावित करता है। लाखों ओबीसी युवाओं को प्रमाणपत्र न बनने या उनकी वैधता को लेकर होने वाली परेशानियों से जूझना पड़ता है। आयोग द्वारा इस मामले पर कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव के साथ विशेष बैठक बुलाने का निर्णय एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसके ठोस नतीजे ही असली बदलाव ला सकते हैं।
मेरठ हमले की जांच: सामाजिक सुरक्षा का सवाल
मेरठ के पांचली गांव में मनोज कश्यप और उनके परिवार पर हुए हमले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित करना दिखाता है कि आयोग सिर्फ नीतिगत मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भी पिछड़े वर्ग के लोगों की सुरक्षा को लेकर संवेदनशील है। यह घटना दलितों और पिछड़ों के खिलाफ हो रहे अपराधों की बढ़ती संख्या के संदर्भ में एक गंभीर संकेत है। समिति की रिपोर्ट के बाद होने वाली कार्रवाई यह तय करेगी कि आयोग महज जांच समितियां बनाने का मंच है या फिर वास्तविक न्याय दिलाने में सक्षम है।

उपलब्धियों और चुनौतियों का द्वंद्व
सोहनलाल श्रीमाली की अगुआई वाला पिछड़ा वर्ग आयोग निस्संदेह सक्रिय है और उसने कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया है। सहकारी समितियों में आरक्षण, नए बोर्डों का गठन, और जातीय सर्वेक्षण की दिशा में उठाए गए कदम ऐतिहासिक हो सकते हैं। लेकिन असली परीक्षा इन सिफारिशों के क्रियान्वयन की है। कितनी सिफारिशें सरकार की मंजूरी पाती हैं? कितने बोर्ड वास्तविक रूप से काम करना शुरू करते हैं? क्या ओबीसी प्रमाणपत्रों की समस्या सुलझती है? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब आयोग की सफलता तय करेंगे।
एक बात स्पष्ट है – आयोग ने पिछड़े वर्ग के मुद्दों को एक नई ऊर्जा और दिशा दी है। चाहे वह पंचायत चुनावों में आरक्षण की कानूनी लड़ाई हो या सहकारी समितियों में 27% आरक्षण का ऐतिहासिक फैसला, आयोग ने यह साबित किया है कि वह सिर्फ एक सलाहकार निकाय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का एक मजबूत मंच बनने की क्षमता रखता है। अब जरूरत है इन फैसलों को जमीनी स्तर पर लागू करने की ठोस रणनीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति की। अगर ऐसा होता है, तो सोहनलाल श्रीमाली का कार्यकाल उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा।

BRIJESH MAURYA The Hind Manch के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। उन्हें कंटेंट राइटिंग में 8 वर्षों का अनुभव है। लखनऊ, उत्तर प्रदेश के निवासी बृजेश सामाजिक और समसामयिक विषयों पर तथ्यपूर्ण एवं निष्पक्ष लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्हें यात्रा करना और किताबें पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।