जानें! क्या सच में प्राचीन भारत में छुआछूत था? या यह एक सुनियोजित साजिश थी?
क्या आपने कभी सोचा है कि पुराने जमाने में, जब आधुनिक अस्पताल नहीं हुआ करते थे, तो बच्चे की नाभि कौन काटता था? या फिर आपके घर में कुएँ से पानी कौन लाता था, आपके लिए पत्तल कौन बनाता था, और आपके कपड़े कौन धोता था? शादी के मंडप में नाईं और धोबन की मौजूदगी क्यों अनिवार्य होती थी? और अंतिम यात्रा में कंधा देने वाले वे कौन लोग होते थे?
ये सवाल हमें एक गहरे सत्य की ओर ले जाते हैं। हमारा समाज सदियों से परस्पर निर्भरता की एक मजबूत डोर से बंधा हुआ था। जीवन की शुरुआत से लेकर अंतिम संस्कार तक, हर रस्म में अलग-अलग समुदायों के लोगों की अहम भूमिका होती थी . यह एक ऐसा इकोसिस्टम था जहाँ हर जाति का एक सम्मानजनक स्थान था और हर कोई एक-दूसरे के पूरक थे। फिर यह छुआछूत की बीमारी कहाँ से आई? आइये, इस लेख में हम इतिहास के पन्नों को पलटकर इस सच्चाई को उजागर करने की कोशिश करते हैं।
परस्पर निर्भरता का वह ताना-बाना जो आज टूट गया
हमारे पूर्वज भली-भाँति समझते थे कि एक गाँव या समाज को चलाने के लिए हर कौशल की आवश्यकता होती है। यही कारण था कि विभिन्न जातियाँ, जो मुख्यतः व्यवसाय आधारित थीं , एक साथ मिलजुल कर रहती थीं।
जीवन चक्र के हर पड़ाव पर अटूट सहयोग
· जन्म से लेकर विवाह तक: बच्चे के जन्म के समय नाई (हज्जाम) या धाई का होना, मुंडन संस्कार में उनका स्पर्श, शादी के मंडप में नाईं और धोबन का होना और लड़की के पिता द्वारा उनके लिए साड़ी की मांग करना – ये सिर्फ रस्में नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक और आर्थिक रिश्ते की निशानी थीं।
· दैनिक जीवन से लेकर पूजा-पाठ तक: कुम्हार के बिना सुराही और बर्तन अधूरे थे, धोबी के बिना साफ कपड़े, नाई के बिना पत्तल-दोने और वाल्मीकि समुदाय द्वारा बनाए गए सूप के बिना छठ जैसे पर्व अधूरे थे। ये सभी एक-दूसरे के प्रति सम्मान और विश्वास को दर्शाते हैं।
· अंतिम यात्रा तक: डोली को कंधा देने वाले और अंत में चिता जलाने में सहायक होने वाले लोग भी इसी व्यवस्था का हिस्सा थे। यह रिश्ता सिर्फ सेवा तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें अटूट विश्वास और आस्था थी।
यह परस्पर निर्भरता बताती है कि जातियाँ थीं, पर उनके मध्य प्रेम की एक धारा भी बहती थी। किसी को कभी न कभी किसी न किसी को स्पर्श करना ही पड़ता था।
प्राचीन भारत का स्वर्णिम इतिहास: जब जाति, शोषण का आधार नहीं थी
अगर हम वैदिक काल और रामायण-महाभारत काल के इतिहास पर नज़र डालें, तो जातिवाद और छुआछूत की कहानी कहीं नज़र नहीं आती। बल्कि, हमें योग्यता, कर्म और सम्मान के अनेक उदाहरण मिलते हैं .

रामायण और महाभारत के साक्ष्य
· राम और निषादराज: प्रभु श्रीराम ने न केवल निषादराज से मित्रता की, बल्कि उनके साथ गुरुकुल में शिक्षा भी ग्रहण की। लव-कुश ने वनवासी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में शिक्षा पाई .
· कृष्ण और सुदामा: श्रीकृष्ण स्वयं यादव (ग्वाला) समुदाय में जन्मे , उनके भाई बलराम कृषक थे (हलधर), और उन्होंने सुदामा (एक गरीब ब्राह्मण) के पैर धोए। यह जातिगत श्रेष्ठता का नहीं, बल्कि प्रेम और समानता का उदाहरण है।
· महाभारत के उदाहरण: सम्राट शांतनु ने मछुआरे की पुत्री सत्यवती से विवाह किया, जिसके लिए भीष्म ने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया . महाभारत के रचयिता वेदव्यास मछुआरे कुल के थे . विदुर, जो एक दासी पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने और उनकी विदुर नीति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है . भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया .
साम्राज्यों के प्रमाण: शासक वे बने जिन्हें आज पिछड़ा कहा जाता है
इतिहास गवाह है कि प्राचीन काल में सत्ता पर उन्हीं वर्गों का 92% समय तक शासन रहा, जिन्हें आज “दलित” या “पिछड़ा” कहा जाता है .
· नन्द वंश: मगध के इस शक्तिशाली राजवंश के संस्थापक महापद्मनंद एक नाई (बार्बर) जाति से थे .
· मौर्य वंश: चन्द्रगुप्त मौर्य, जिन्होंने पूरे भारत में विशाल साम्राज्य स्थापित किया, एक मोर पालक परिवार से थे और ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें सम्राट बनाया .
· गुप्त वंश: गुप्त वंश के शासक, जिनके काल को भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है, घोड़ों का व्यापार करने वाले परिवार से थे .
मध्यकाल और मराठा काल में भी जारी रही समरसता
· संत परंपरा: राजपूत राजा की पुत्री मीरा बाई के गुरु एक चर्मकार (रविदास जी) थे, और रविदास जी के गुरु ब्राह्मण (रामानंद जी) थे .
· मराठा साम्राज्य: बाजीराव पेशवा ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा और चरवाहा (गड़रिया) होलकर को मालवा का शासक बनाया . देवी अहिल्याबाई होलकर, जिन्होंने देशभर में मंदिरों और गुरुकुलों का जीर्णोद्धार कराया, इसी होलकर वंश की महान शासिका थीं .
तो कहाँ से आई छुआछूत की यह बीमारी?
यदि हमारा इतिहास समरसता, प्रेम और योग्यता से भरा हुआ था, तो फिर यह विषैला जातिवाद और छुआछूत आया कहाँ से?
मुगलों का आगमन और सामाजिक ढाँचे में दरार
इतिहासकारों का मानना है कि मुगल काल में पर्दा प्रथा, बाल विवाह और कुछ कुरीतियों का प्रचलन बढ़ा, जिससे सामाजिक समरसता को ठेस पहुंची . हालाँकि, इस दौरान भी आपसी सहयोग और सांस्कृतिक समन्वय पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।
अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति
अधिकतर इतिहासकार और विचारक इस बात पर सहमत हैं कि जातिवाद और छुआछूत को एक सख्त सामाजिक दीवार का रूप अंग्रेजों ने दिया।
· 1901 की जनगणना और जाति: अंग्रेजों ने 1901 में पहली बार विस्तृत जाति जनगणना करवाई और जातियों को एक कठोर पदानुक्रम में बांटने का काम किया। उनका मकसद था – भारतीय समाज को तोड़ना और उन पर राज करना .
· साजिश का दस्तावेजीकरण: ब्रिटिश अधिकारी निकोलस डर्क्स की पुस्तक “कास्ट ऑफ माइंड” (Castes of Mind) में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि कैसे अंग्रेजों ने भारत में जातिवाद को बढ़ावा दिया । इससे पहले, भारत आने वाले किसी भी विदेशी यात्री (मेगास्थनीज, फाहियान, ह्वेनसांग, अलबरूनी) ने यह नहीं लिखा कि यहाँ छुआछूत या जातिगत शोषण था .
जाति में मत टूटिये, धर्म से जुड़िये, देश जोड़िये
यह सच्चाई आज हमारे सामने है कि जातियाँ हमारे समाज की पहचान और श्रम विभाजन (डिवीजन ऑफ लेबर) का हिस्सा थीं, जो समय के साथ कठोर हो गईं , लेकिन प्राचीन काल में यह कभी छुआछूत या शोषण का आधार नहीं थीं। विदेशी शासकों और अपने ही कुछ स्वार्थी लोगों ने इस सुंदर व्यवस्था में जहर घोलकर हमें आपस में लड़ा दिया।
आज जरूरत है कि हम अपने इतिहास के उस स्वर्णिम पक्ष को फिर से अपनाएँ, जहाँ हर जाति, हर व्यवसाय को सम्मान मिलता था।
· राम ने सबरी के जूठे बेर खाए।
· कृष्ण ने सुदामा के पैर धोए।
· भीम ने हिडिम्बा से विवाह किया।
· चाणक्य ने एक मोर पालक चन्द्रगुप्त को सम्राट बनाया।
सभी जातियाँ सम्माननीय हैं और हर हाथ जो इस देश को बनाता है, अनमोल है। आइए, उस साजिश को समझें जिसने हमें तोड़ा और फिर से उस एक भारत, श्रेष्ठ भारत की भावना को जगाएँ जो हमारी सनातन संस्कृति का आधार रही है।
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BRIJESH MAURYA The Hind Manch के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। उन्हें कंटेंट राइटिंग में 8 वर्षों का अनुभव है। लखनऊ, उत्तर प्रदेश के निवासी बृजेश सामाजिक और समसामयिक विषयों पर तथ्यपूर्ण एवं निष्पक्ष लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्हें यात्रा करना और किताबें पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।