कुर्द-ईरान संघर्ष: जानें! कौन हैं कुर्द? अमेरिका, इजराइल और 400 साल पुरानी दुश्मनी की कहानी
जमीन पर उतरेगा युद्ध? कुर्दों पर टिकी अमेरिकी निगाहें
जब से अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू किए हैं , तब से यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या इस युद्ध में जमीनी घुसपैठ होगी? खबरें यह हैं कि अमेरिका इस युद्ध में अपने सैनिक नहीं उतारना चाहता, बल्कि इसके लिए ईरान के ही कुर्द अल्पसंख्यकों को आगे करने की रणनीति बना रहा है । हालाँकि हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्होंने कुर्दों को युद्ध में शामिल न होने की सलाह दी है, ताकि संघर्ष और जटिल न हो , लेकिन इससे पहले मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि सीआईए ईरानी कुर्द समूहों को हथियार मुहैया करा रही है और उनके नेताओं से बातचीत कर रही है । ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ये कुर्द कौन हैं, जिनके बूते अमेरिका ईरान जैसे देश को चुनौती देना चाहता है?
कौन हैं कुर्द? (Who are the Kurds?)
कुर्द दुनिया के सबसे बड़े राष्ट्रहीन समुदाय (Stateless Nation) में से एक हैं। इनकी कुल आबादी लगभग 3 से 4 करोड़ के बीच है, जो मुख्य रूप से तुर्की,यहाँ कुर्दों के बारे में एक विस्तृत लेख प्रस्तुत है, जिसमें उनकी पहचान, इतिहास, संस्कृति और वर्तमान राजनीतिक स्थिति को शामिल किया गया है।
वो समुदाय जिसके पास कोई देश नहीं, पर एक पहचान है
मध्य पूर्व के राजनीतिक समीकरणों में सबसे जटिल और चर्चित नाम है – कुर्द। ये वो समुदाय है जिसकी अपनी कोई संप्रभु सरकार नहीं, पर अपनी एक अलग पहचान, भाषा, संस्कृति और इतिहास है। तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया के पहाड़ी इलाकों में फैले इस जातीय समूह को अक्सर “दोस्तों के बिना राष्ट्र” कहा जाता है, क्योंकि सदियों से महाशक्तियों ने उन्हें अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया और बाद में धोखा दिया ।
कुर्दों की कहानी संघर्ष, साहस और स्वतंत्रता की अदम्य चाहत की कहानी है। आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं कि आखिर ये कुर्द कौन हैं, उनका इतिहास क्या है, वे कहां रहते हैं और क्यों आज वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं।
भौगोलिक वितरण: चार देशों में बंटा “कुर्दिस्तान” (Geographical Distribution)
कुर्दों का पैतृक क्षेत्र, जिसे वे “कुर्दिस्तान” (कुर्दों की भूमि) कहते हैं, दक्षिण पश्चिम एशिया के उस पहाड़ी इलाके में फैला है जहां चार देशों की सीमाएं मिलती हैं। यह क्षेत्र पश्चिम में टॉरस पर्वत से लेकर पूर्व में ज़ाग्रोस पर्वत तक फैला हुआ है ।
विश्व में कुर्दों की कुल आबादी का अनुमान 3 करोड़ से साढ़े 4 करोड़ के बीच है, जो उन्हें अरबों, फारसियों और तुर्कों के बाद मध्य पूर्व का चौथा सबसे बड़ा जातीय समूह बनाता है । विभिन्न देशों में उनका वितरण कुछ इस प्रकार है:
तुर्की
तुर्की में दुनिया की सबसे बड़ी कुर्द आबादी निवास करती है। अनुमानित 1.4 करोड़ से 2 करोड़ कुर्द यहां रहते हैं, जो देश की आबादी का लगभग 18-25% है। ये मुख्यतः देश के दक्षिण-पूर्वी इलाकों में केंद्रित हैं ।
ईरान
ईरान में लगभग 82 लाख से 1.2 करोड़ कुर्द निवास करते हैं, जो कुल आबादी का करीब 10% हैं । ये ज्यादातर ईरान के पश्चिमी प्रांतों, इराकी सीमा के पास, और कुर्दिस्तान प्रांत में रहते हैं। अधिकांश ईरानी कुर्द सुन्नी मुसलमान हैं, जबकि ईरान का शासन शिया बहुल है – यह धार्मिक अंतर भी उनके संघर्ष का एक प्रमुख कारण रहा है ।
इराक
इराक में लगभग 56 लाख से 85 लाख कुर्द हैं । उत्तरी इराक में स्थित कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार (KRG) को व्यापक स्वायत्तता प्राप्त है, जो कुर्दों के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जाती है । यहां की राजधानी एरबिल है।
सीरिया
सीरिया में लगभग 15 लाख से 36 लाख कुर्द रहते हैं, जो देश के उत्तर-पूर्वी हिस्सों में केंद्रित हैं । दशकों तक सीरियाई सरकार ने उनके साथ भेदभाव किया और हजारों कुर्दों को नागरिकता से वंचित रखा ।
प्रवासी समुदाय (Diaspora)
इनके अलावा, यूरोप (विशेषकर जर्मनी में लगभग 12-15 लाख), काकेशस क्षेत्र (आर्मेनिया, अजरबैजान), और उत्तरी अमेरिका में भी बड़ी संख्या में कुर्द प्रवासी रहते हैं ।
भाषा और संस्कृति: कुर्द पहचान की आधारशिला (Language and Culture)
कुर्द भाषा (Kurdish Language)
कुर्द भाषा हिन्द-यूरोपीय भाषा परिवार की ईरानी शाखा से संबंधित है और फारसी (पारसी) व पश्तो से इसका गहरा संबंध है । इसे मुख्यतः दो प्रमुख बोलियों में बांटा गया है:
- कुरमानजी (Kurmanji): उत्तरी बोली, जो तुर्की, सीरिया और उत्तरी इराक में बोली जाती है।
- सोरानी (Sorani): दक्षिणी-मध्य बोली, जो ईरानी कुर्दिस्तान और दक्षिणी इराक में प्रचलित है ।
इसके अलावा, ज़ाज़ा और गोरानी भी कुर्दों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं हैं, हालांकि भाषाविदों में इनके वर्गीकरण को लेकर मतभेद है । इराक में कुर्द को अरबी के साथ आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है, जबकि ईरान में इसे क्षेत्रीय भाषा का दर्जा हासिल है ।
पारंपरिक जीवन शैली
पारंपरिक रूप से कुर्द खानाबदोश (nomadic) या अर्ध-खानाबदोश जीवन जीते थे, जो भेड़-बकरी पालन पर निर्भर था। वे मेसोपोटामिया के मैदानों और तुर्की-ईरान के ऊंचे इलाकों के बीच मौसमी प्रवास करते थे । प्रथम विश्व युद्ध के बाद राष्ट्रीय सीमाओं के निर्धारण ने इस पारंपरिक जीवन शैली को समाप्त कर दिया, जिससे अधिकांश कुर्द गांवों और शहरों में बस गए ।
धर्म: विविधता में एकता (Religion)
कुर्द समाज धार्मिक रूप से विविधतापूर्ण है, हालांकि बहुमत सुन्नी इस्लाम का अनुयायी है।
सुन्नी इस्लाम (Sunni Islam)
अधिकांश कुर्द शाफी मत के सुन्नी मुसलमान हैं, जबकि एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक हनफी मत का पालन करता है । कई कुर्द सूफीवाद से भी प्रभावित हैं, विशेषकर नक्शबंदी और कादिरी सिलसिलों से ।
यज़ीदी धर्म (Yazidism)
यज़ीदी कुर्दों का एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय है, जो मुख्यतः इराक के सिंजार क्षेत्र में रहता है। यह एक प्राचीन इरानी धर्म है, जिसकी जड़ें पारसी धर्म से पहले की मानी जाती हैं । यज़ीदी एक ईश्वर और सात पवित्र प्राणियों में विश्वास करते हैं, जिनके प्रमुख तवूसे मेलेक (मोर देवदूत) हैं। दुनियाभर में इनकी आबादी लगभग 7 से 10 लाख है ।
यारसानी या अहल-ए-हक (Yarsanism)
यह धर्म भी मुख्यतः कुर्द क्षेत्रों में पाया जाता है, खासकर ईरान और इराक में। इनके धार्मिक ग्रंथ गोरानी भाषा में हैं। ईरान में इनकी संख्या 20 लाख से अधिक बताई जाती है, हालांकि उन्हें राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया है ।
अन्य धर्म
इनके अलावा, कुर्दों में शिया मुसलमान, अलेवी और ईसाई अल्पसंख्यक भी मौजूद हैं ।
कुर्दों का संपूर्ण इतिहास (Complete History of Kurds)
कुर्दों का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है, जो साम्राज्यों के उत्थान-पतन, युद्धों और संधियों से होकर गुजरा है।
प्राचीन काल: मूल की खोज (Ancient Origins)
कुर्दों की उत्पत्ति के बारे में कई सिद्धांत हैं। कुछ इतिहासकार उन्हें प्राचीन मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित गुटी (Guti) जनजाति से जोड़ते हैं, जो तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में ज़ाग्रोस पर्वत में रहते थे । यूनानी इतिहासकार जेनोफोन ने अपनी पुस्तक ‘अनाबेसिस’ में कार्दूखोई (Karduchoi) नामक एक योद्धा जनजाति का वर्णन किया है, जिसे कई विद्वान कुर्दों का पूर्वज मानते हैं ।
इस्लामी काल और कुर्द राजवंश (Islamic Period & Kurdish Dynasties)
7वीं शताब्दी में इस्लाम के आगमन के साथ, “कुर्द” शब्द का प्रयोग एक जातीय पहचान के रूप में होने लगा ।
10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच, कुर्दों ने कई शक्तिशाली राजवंशों की स्थापना की:
- हसनवैहिद (Hasanwayhids)
- मरवानिद (Marwanids)
- रवादिद (Rawadids)
- शद्दादिद (Shaddadids)
इनमें सबसे प्रसिद्ध था अय्यूबिद वंश (Ayyubid dynasty), जिसकी स्थापना महान कुर्द योद्धा सलाउद्दीन अय्यूबी (Saladin) ने की थी। सलाउद्दीन ने 12वीं शताब्दी में क्रूसेडरों से येरुशलम को मुक्त कराया और मिस्र से लेकर यमन तक एक विशाल साम्राज्य पर शासन किया ।
सफवी और उस्मानी काल: कुर्दिस्तान का विभाजन (Safavid & Ottoman Era)
16वीं शताब्दी में, दो प्रतिद्वंद्वी साम्राज्य – सुन्नी उस्मानी (तुर्क) और शिया सफवी (फारसी) – के बीच प्रतिद्वंद्विता चरम पर थी। 1514 में हुई चाल्दिरान की लड़ाई (Battle of Chaldiran) कुर्द इतिहास का निर्णायक मोड़ साबित हुई । इसके बाद, कुर्द क्षेत्र दो साम्राज्यों के बीच बंट गया। 1639 की ज़ुहाब की संधि ने इस विभाजन को स्थायी कर दिया, जो आज की ईरान-इराक और ईरान-तुर्की सीमा का आधार बनी ।
इसी काल में कुर्दों ने अपनी स्थानीय रियासतें कायम रखीं, जैसे बाबान, सोरान, बदीनान, हक्कारी, और अर्दलान। इनका इतिहास 1597 में लिखे गए पहले कुर्द इतिहास ग्रंथ ‘शरफनामा’ (Sharafnama) में विस्तार से दर्ज है ।
20वीं सदी: स्वतंत्रता का सपना और विश्वासघात (The Dream of Independence)
प्रथम विश्व युद्ध और सेव्रेस की संधि (Treaty of Sèvres)
प्रथम विश्व युद्ध में उस्मानी साम्राज्य की हार के बाद, 1920 में सेव्रेस की संधि पर हस्ताक्षर हुए। इस संधि के अनुच्छेद 62-64 में एक स्वतंत्र कुर्दिस्तान के गठन का प्रावधान था । यह कुर्दों के लिए ऐतिहासिक क्षण था।
लुसाने की संधि और सपने का टूटना (Treaty of Lausanne)
लेकिन तुर्की के नेता मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में हुए स्वतंत्रता संग्राम के बाद, 1923 में लुसाने की संधि हुई, जिसने सेव्रेस का स्थान लिया। इस नई संधि में कुर्दिस्तान या कुर्दों का कोई जिक्र नहीं था । कुर्द क्षेत्र तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया (फ्रांस के अधिदेश) के बीच बंट गए और कुर्दों का सपना एक झटके में टूट गया।
महाबाद गणराज्य (Republic of Mahabad)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, सोवियत संघ के समर्थन से 1946 में ईरान के कुर्द क्षेत्र में महाबाद गणराज्य की स्थापना हुई। यह आधुनिक कुर्द राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। काजी मुहम्मद के नेतृत्व में बना यह गणराज्य केवल एक वर्ष चला। सोवियत संघ के हटने के बाद, ईरानी सेना ने इसे कुचल दिया और काजी मुहम्मद को फांसी दे दी गई ।
पेशमर्गा: जो मौत का सामना करते हैं (Peshmerga: Those Who Face Death)
पेशमर्गा (Peshmerga) कुर्द योद्धाओं को कहा जाता है। कुर्द भाषा में इसका अर्थ है – “वे जो मौत का सामना करते हैं” । यह केवल एक सैन्य बल नहीं, बल्कि कुर्द पहचान और स्वतंत्रता के संघर्ष का प्रतीक है।
उद्भव और इतिहास (Origin)
पेशमर्गा की जड़ें 19वीं सदी के अंत में उस्मानी साम्राज्य के खिलाफ कुर्द जनजातीय प्रतिरोध में मिलती हैं। 20वीं सदी की शुरुआत में इन्हें औपचारिक रूप से संगठित किया गया ।
आधुनिक पेशमर्गा (Modern Peshmerga)
आज पेशमर्गा इराकी कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार की आधिकारिक सैन्य शक्ति है, जिसमें लगभग 1,90,000 लड़ाके शामिल हैं । उन्होंने आईएसआईएस (ISIS) के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अमेरिकी गठबंधन बलों के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे । ईरानी कुर्द विपक्षी समूहों के पास भी अपने सशस्त्र दल हैं, जिन्हें वे पेशमर्गा ही कहते हैं ।
समकालीन संघर्ष और राजनीतिक स्थिति (Contemporary Conflict)
तुर्की और पीकेके (PKK) संघर्ष
तुर्की में कुर्द अल्पसंख्यक दशकों से सांस्कृतिक और राजनीतिक भेदभाव का सामना कर रहे हैं। 1978 में अब्दुल्ला ओजालन ने कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (PKK) की स्थापना की, जो एक मार्क्सवादी संगठन है और स्वतंत्र कुर्दिस्तान के लिए लड़ रहा है । 1984 से शुरू हुए इस संघर्ष में अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं। पीकेके को तुर्की, अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है ।
सीरियाई कुर्द और स्वायत्तता (Syrian Kurds & Autonomy)
सीरिया के गृहयुद्ध के दौरान, कुर्द बहुल उत्तरी क्षेत्रों में पीवाईडी (PYD) और उसके सशस्त्र विंग वाईपीजी (YPG) ने नियंत्रण स्थापित कर लिया। उन्होंने उत्तरी और पूर्वी सीरिया का स्वायत्त प्रशासन (AANES) की घोषणा की, जिसे आमतौर पर रोजावा (Rojava) कहा जाता है। अमेरिका ने आईएसआईएस के खिलाफ लड़ाई में वाईपीजी को अपना मुख्य जमीनी सहयोगी बनाया, जिससे तुर्की नाराज हो गया क्योंकि वह वाईपीजी को पीकेके की शाखा मानता है ।
ईरानी कुर्द और नया गठबंधन (Iranian Kurds’ New Alliance)
हाल ही में, ईरानी कुर्दिस्तान के पांच प्रमुख विपक्षी समूहों – पीडीकेआई, पीजेएके, पीएके, कोमाला और खबात – ने ईरानी शासन के खिलाफ एक गठबंधन बनाया है । इन समूहों का उद्देश्य अलग देश बनाना नहीं, बल्कि ईरान के भीतर एक लोकतांत्रिक, विकेंद्रीकृत व्यवस्था स्थापित करना है । हालांकि, उनके पास आधुनिक हथियारों की कमी है और वे अमेरिकी समर्थन की प्रतीक्षा कर रहे हैं ।
हालिया घटनाक्रम: महसा अमीनी और “जीवन, स्वतंत्रता, महिला” आंदोलन
सितंबर 2022 में, ईरानी कुर्द महिला महसा जीना अमीनी की हिजाब न पहनने के कारण “मोरेलिटी पुलिस” की हिरासत में मौत हो गई। इस घटना ने पूरे ईरान में विद्रोह की लहर पैदा कर दी। “जीवन, स्वतंत्रता, महिला” (Woman, Life, Freedom) के नारे के साथ शुरू हुआ यह आंदोलन ईरान के इतिहास का सबसे बड़ा जनआंदोलन बन गया, जिसमें कुर्दों की भूमिका केंद्रीय थी ।
एक अनिश्चित भविष्य (An Uncertain Future)
कुर्द आज भी वही सवाल पूछ रहे हैं जो 100 साल पहले पूछते थे – उन्हें अपनी पहचान के साथ जीने का अधिकार कब मिलेगा? इराक में उन्हें स्वायत्तता मिली है, सीरिया में उन्होंने अपना प्रशासन खड़ा कर लिया है, लेकिन तुर्की और ईरान में वे अभी भी संघर्षरत हैं।
एक पुरानी कुर्द कहावत है: “हमारा कोई दोस्त नहीं, सिवाय पहाड़ों के” । यह वाक्य उनके सदियों के अकेलेपन और संघर्ष को बयां करता है। चाहे वह 1920 की सेव्रेस संधि हो, 1975 का अमेरिकी विश्वासघात, या 1991 के विद्रोह के बाद सद्दाम के अत्याचार – कुर्दों ने हर बार कीमत चुकाई है।
आज जब पूरा मध्य पूर्व बदल रहा है, कुर्द एक बार फिर इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं। उनके पास एक सुनहरा अवसर भी है और गहरा खतरा भी। क्या वे अपनी सदियों पुरानी मांग को पूरा कर पाएंगे, या फिर से इतिहास के पन्नों में धोखा खाए एक समुदाय की कहानी बनकर रह जाएंगे? यह समय ही बताएगा। ईरान, इराक और सीरिया के पहाड़ी इलाकों में फैली हुई है । इन चारों देशों की सीमाओं से घिरा इस क्षेत्र को कुर्द लोग “कुर्दिस्तान” (कुर्दों की भूमि) कहते हैं।
ईरान से दुश्मनी का इतिहास (History of Conflict with Iran)
कुर्दों और ईरान के केंद्रीय शासन के बीच संघर्ष की जड़ें सदियों पुरानी हैं, लेकिन इसने आधुनिक दौर में और विकराल रूप ले लिया।
सफवी काल से पहचान का संकट
ईरान में कुर्दों के साथ भेदभाव का इतिहास सफवी साम्राज्य (16वीं-18वीं शताब्दी) से शुरू होता है, जब सुन्नी कुर्दों को जबरन शिया बनाने की कोशिश की गई और कई को मार दिया गया । इसी दौरान जनसांख्यिकी बदलने के लिए कुर्द इलाकों में अज़री तुर्कों को बसाया गया, जो आज भी सांप्रदायिक तनाव की एक वजह है ।
20वीं सदी और महाबाद गणराज्य
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, सोवियत संघ के समर्थन से 1946 में ईरान के कुर्द इलाके में महाबाद गणराज्य (Republic of Mahabad) की स्थापना हुई, जो आधुनिक कुर्द राष्ट्रवाद की एक महत्वपूर्ण घटना थी। लेकिन सोवियत संघ के हटने के बाद, ईरानी सेना ने इस गणराज्य को खत्म कर दिया और इसके नेता फाजी मोहम्मद को फांसी दे दी गई । यह घटना कुर्दों के साथ विश्वासघात का पहला बड़ा उदाहरण बनी।
1979 की इस्लामी क्रांति और जिहाद का ऐलान
जब 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई, तो कुर्दों ने उम्मीद लगाई कि उन्हें अब स्वायत्तता (Autonomy) मिलेगी। उन्होंने नई सरकार का समर्थन किया, लेकिन आयतुल्लाह खुमैनी ने न केवल उनकी मांगों को ठुकराया, बल्कि कुर्दों के खिलाफ “जिहाद” का ऐलान कर दिया । 1979 से 1983 के बीच हजारों कुर्द मारे गए ।
महसा अमीनी की मौत और नया जनजागरण
हाल के इतिहास में, कुर्द महिला महसा जीना अमीनी की सितंबर 2022 में हिजाब न पहनने के कारण “मोरेलिटी पुलिस” की हिरासत में मौत ने पूरे ईरान में आग लगा दी । “जीवन, स्वतंत्रता, महिला” (Woman, Life, Freedom) के नारे के साथ शुरू हुआ यह विद्रोह ईरान के इतिहास का सबसे बड़ा जनआंदोलन बन गया, जिसमें कुर्दों की भूमिका केंद्रीय थी ।
वर्तमान संघर्ष: अमेरिका, इजराइल और कुर्दों का जोखिम भरा खेल (The Current Conflict)

क्यों अमेरिका को कुर्दों की जरूरत है?
अमेरिका और इजराइल के पास हवाई शक्ति तो है, लेकिन ईरान पर पूरी तरह कब्जा करने या उसे अस्थिर करने के लिए जमीनी ताकत की जरूरत होती है। अमेरिका अपने सैनिकों की जान जोखिम में नहीं डालना चाहता, इसलिए वह ईरानी विपक्षी समूहों की तलाश में था और कुर्द उसके लिए सबसे संगठित और सक्षम विकल्प के रूप में सामने आए । रिपोर्ट्स के मुताबिक, पांच प्रमुख ईरानी कुर्द विपक्षी समूहों (KDPI, PAK, PJAK, Komala, Khabat) ने हाल ही में एक गठबंधन बनाया है, जिसका उद्देश्य ईरान में शासन परिवर्तन है ।
क्या चाहते हैं ईरानी कुर्द?
ईरानी कुर्द नेता इस मौके को चूकना नहीं चाहते। उनका कहना है कि वे 47 साल से इसी दिन का इंतजार कर रहे थे । उनका लक्ष्य अलग देश बनाना नहीं, बल्कि ईरान के भीतर एक लोकतांत्रिक, विकेंद्रीकृत व्यवस्था स्थापित करना है, जहां उन्हें सांस्कृतिक और राजनीतिक अधिकार मिल सकें । हालाँकि, उनके पास आधुनिक हथियारों की कमी है और वे अमेरिकी हवाई सुरक्षा (नो-फ्लाई जोन) की मांग कर रहे हैं, क्योंकि ईरानी सेना के खिलाफ अकेले जाना “आत्मघाती” हो सकता है ।
ऐतिहासिक विश्वासघात का साया
कुर्दों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका पर भरोसा किया जा सकता है? इतिहास गवाह है:
- 1975: अमेरिका और ईरान के शाह ने इराकी कुर्दों को हथियारबंद किया, लेकिन जब शाह और इराक के बीच समझौता हो गया, तो कुर्दों को बीच में ही छोड़ दिया गया ।
- 1991: पहले खाड़ी युद्ध के बाद, अमेरिका ने कुर्दों को सद्दाम हुसैन के खिलाफ विद्रोह करने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन जब इराकी सेना ने जवाबी कार्रवाई की, तो अमेरिका ने हस्तक्षेप नहीं किया, जिससे हजारों कुर्द मारे गए ।
- 2026 (हालिया): सीरिया में, अमेरिका ने आईएसआईएस के खिलाफ कुर्द नेतृत्व वाली एसडीएफ (SDF) ताकतों का साथ दिया, लेकिन बाद में तुर्की के दबाव में उनका साथ छोड़ दिया और उनके 80 प्रतिशत इलाके पर कब्जा होने दिया ।
इन ऐतिहासिक घटनाओं को देखते हुए कुर्द नेताओं में अमेरिका के प्रति गहरा अविश्वास है। इराकी कुर्दिस्तान के नेता ने पहले ही साफ कर दिया है कि वे इस संघर्ष का हिस्सा नहीं बनेंगे ।
जंग का मैदान: मौजूदा स्थिति और आगे की राह (Current Situation and Future)
तुर्की और ईरान की प्रतिक्रिया
कुर्दों का कोई भी सैन्य अभियान क्षेत्रीय भूकंप पैदा कर सकता है। तुर्की लंबे समय से पीकेके (PKK) के खिलाफ लड़ रहा है, जिसके ईरानी कुर्द समूह पीजेएके (PJAK) से संबंध हैं । विश्लेषकों का मानना है कि तुर्की और ईरान मिलकर किसी भी कुर्द विद्रोह को कुचलने के लिए समन्वय कर सकते हैं । ईरान पहले ही इराकी कुर्दिस्तान में कुर्द ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले कर चुका है ।
क्या सफल हो सकता है यह दांव?
विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है:
- सैन्य दृष्टिकोण: कुछ का मानना है कि कुर्द सेनानी ईरानी सेना के लिए “परेशानी” पैदा कर सकते हैं, लेकिन निर्णायक भूमिका नहीं निभा सकते । वे हल्के हथियारों से लैस हैं, जबकि ईरान के पास भारी सैन्य शक्ति है ।
- राजनीतिक जोखिम: एक बड़ा खतरा यह है कि कुर्दों का यह हमला ईरान में फारसी राष्ट्रवाद को हवा दे सकता है। ईरान का शासन इसे “देश के विभाजन” की साजिश बताकर अपने समर्थकों को एकजुट कर सकता है, ठीक वैसे ही जैसे 1980 में इराक के हमले के समय हुआ था ।
कुर्द आज एक ऐतिहासिक चौराहे पर खड़े हैं। उनके सामने अवसर भी है और खतरा भी। अगर अमेरिका उन्हें हवाई सुरक्षा और ठोस राजनीतिक समर्थन देता है, तो वे ईरान के भीतर एक ताकत बन सकते हैं और अपने सदियों पुराने सपने को साकार कर सकते हैं। लेकिन अगर उन्हें फिर से धोखा मिलता है, तो यह उनके लिए एक नई त्रासदी होगी। कहावत है, “कुर्दों के कोई दोस्त नहीं, सिर्फ पहाड़ हैं” । आने वाले दिन यह तय करेंगे कि यह कहावत आज भी सच साबित होती है या फिर इतिहास के इस मोड़ पर कुर्दों को नए सहयोगी मिलेंगे।

BRIJESH MAURYA The Hind Manch के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। उन्हें कंटेंट राइटिंग में 8 वर्षों का अनुभव है। लखनऊ, उत्तर प्रदेश के निवासी बृजेश सामाजिक और समसामयिक विषयों पर तथ्यपूर्ण एवं निष्पक्ष लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्हें यात्रा करना और किताबें पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।