द्वापरयुगी इतिहास है, ओखला के अखिलेश्वर मंदिर का
Akhileshwar Tample khargon : जिनका रोम रोम सियाराम के नाम को पुकारता हो, जिनके ह्रदय में सियाराम का साक्षात् स्वरुप बसता हो, जिन्हें माता सीता ने अजर अमर होने का वरदान देकर चिरंजीवी कर दिया हो, जो राम भक्तों की रक्षा करने के लिए सदैव तत्पर रहते हों, मारुती नंदन अंजनी पुत्र रामभक्त हनुमान की कहानी भी अद्भुद और मन को शान्ति देने वाली होती है। रामभक्त हनुमान जी ने जहाँ जहाँ अपने पग भूमि पर रखे वह भूमि पवित्र पावन और पूजनीय हो गयी है।
आज हम लोग जहाँ की बात कर रहे है वह द्वापर युग से अनेक रहस्यों को समेटे है, जहाँ शिव और हनुमान जी के दोनों रूपों के दर्शन करने का अवसर प्राप्त होता है, मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के बड़वानी के समीप जंगल में अखिलेश्वर हनुमान मंदिर और अखिलेश्वर महादेव मंदिर स्थित है जिनकी कहानी भी बहुत रोचक है।
Akhileshwar Tample khargon : जैसा अन्यत्र कही भी मंदिर नहीं है यह मंदिर इंदौर खंडवा रोड पर बड़वाह से करीब 30 किमी दूर स्थित मंदिर बहुत ही अनोखा मंदिर है, यह एकलौता मंदिर है जहाँ हनुमान जी के हाथ में द्रोणागिरी पर्वत की जगह शिवलिंग को देखा जा सकता है, अखिलेश्वर मठ के नाम से जाना जाने वाला यह स्थान ही है जहां रुद्रावतार हनुमान जी की दुर्लभ प्रतिमा के दर्शन प्राप्त होते हैं।
हनुमान जी के हाथ में शिवलिंग की रोचक कथा:
Akhileshwar Tample khargon : श्री गौतम पारिख जी जो की मंदिर में पुजारी के रूप में मिले उन्होंने बताया…..
श्री राम जी के वनवास काल के समय लंकापति दशानन रावण के द्वारा पंचवटी से माता सीता का हरण करने के बाद श्रीराम जी अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी के साथ माता सीता को खोजते हुए दक्षिण की तरफ क्रमशः जटायु और माता सबरी के बताये मार्ग पर जा रहे थे। तब उनकी मुलाकात हनुमान जी, फिर सुग्रीव से हुई, हनुमान जी ने समुद्र पार कर माता सीता का पता लगाया और श्रीराम जी, सीता माता को मुक्त कराने की योजना बना रहे थे, उस समय नल नील और वानर भालुओं के सहयोग से रामसेतु का निर्माण हुआ।
श्री राम जी युद्ध में विजय के लिए शिव पूजन करने का विचार किया, लेकिन वहां कोई शिवलिंग नहीं था। मान्यता के अनुसार हनुमान जी को शिवलिंग लाने को कहा गया। तब हनुमान जी नर्मदा की सहस्त्रधारा धावड़ी घाट से शिव लिंग लेकर लौट रहे थे। तब अखिलेश्वर मठ के पास महर्षि वाल्मीकि आश्रम होने के कारण हनुमान जी कुछ समय यहाँ रुके थे। मान्यता के अनुसार जब हनुमान जी शिवलिंग लेकर पहुंचे तब तक वहां दूसरे शिवलिंग की स्थापना हो चुकी थी। ऐसा माना जाता है की जो शिवलिंग हनुमान जी ले गए थे, वह आज भी तमिलनाडु के धनुष्कोटि में स्थापित है।

Akhileshwar Tample khargon : श्री गौतम पारिख जी ने बताया कि यहां तीन शिला लेख भी मिले हैं, हालाकि अक्षर स्पस्ट नहीं होने के कारन उन्हें पढ़ा नहीं जा सका, मान्यता के अनुसार यह मंदिर त्रेतायुगीन राजा श्रेयाल जिन्हे श्रीपाल भी कहा जाता है, के द्वारा निर्मित यह मंदिर का क्षेत्र च्यवन ऋषि, महर्षि मार्कण्डेय, और विश्वामित्र जैसे ऋषियों की तपस्थली के रूप में भी जाना जाता रहा है। (मंदिर का वीडियो देखें )
अखिलेश्वर महादेव :
Akhileshwar Tample khargon : यहाँ पर 5000 साल पुराना शिवलिंग भी है जिसे भगवान श्री कृष्णा द्वारा स्थापित बताया जाता है, मान्यता के अनुसार महर्षि वाल्मीकि ने यही पर रामायण के अधिकांश भागों की रचना की थी। महर्षि वाल्मीकि का आश्रम मठ से 20 किलोमीटर दूर ताम्रपूर्ण तमसा नदी ( जिसे वर्तमान में पूर्णी नदी के नाम से जाना जाता है) के तट पर स्थित है।
अखंड रामचरित मानस पाठ :

Akhileshwar Tample khargon : श्री गौतम पारिख जी ने बताया यहां पर पिछले 47 साल से 2 मई 1976 से निरंतर अखण्ड रामायण पारायण (राम चरितमानस) पाठ चल रहा है जिसके लिए “बुक वर्ल्ड ऑफ रिकॉर्ड्स” (लंदन) और “ट्रांसओसियाना वर्ल्ड रिकॉर्ड्स” (अमेरिका USA) से प्रमाणित है, जिसके सर्टिफिकेट प्राप्त है और मंदिर में इनके देखे जा सकते है। मंदिर में शिवरात्रि, कार्तिक पूर्णिमा, वैकुण्ठ चतुर्दशी, और हनुमान जयंती पर विशेष उत्सव का आयोजन होता हैं। अन्य मंदिरों में मंगलवार और शनिवार को चोला चढ़ाया जाता है, लेकिन यहां पर केवल रोहिणी नक्षत्र में ही चोला चढ़ाया जाता है और हनुमान जयंती की पूर्णिमा पर हनुमान जी का सहस्त्रधारा अभिषेक होता है।
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ओखलेश्वर नाम और मंदिर की खोज :

Akhileshwar Tample khargon : लोक मान्यता के अनुसार श्रीपाल (जिन्हे श्रेयाल भी कहा जाता है) राजा हुए जिनका इसके आसपास राज्य था, राजा प्रजा वत्सल और बड़े दानी थे, साथ में अनन्य शिव भक्त भी थे। एकबार भगवान शिव, राजा की परीक्षा लेने के उद्देश्य से राजा के यहां वेश बदलकर गए और राजा से मांस खाने का अनुरोध करने लगे।
राजा ने तत्काल अतिथि सत्कार हेतु जंगली जानवरों का मांस उपलब्ध करा दिया, इस पर वेश बदलकर आये भगवान शिव ने कहा की वह मनुष्य का मांस ही खाएंगे, तब राजा ने कहा ठीक है, मैं राज्य से किसी मनुष्य का मांस आपको उपलब्ध करा देता हूँ। इस पर अतिथि रूपी शिव जी ने कहा, आप प्रजा पालक राजा किसी प्रजाजन का मांस कैसे उपलब्ध करा सकते हैं।
राजा को अपनी गलती का भान हुआ तो वह खुद को अतिथि के सामने प्रस्तुत कर दिया, अतिथि ने कहा आप वृद्ध है में आपका मांस ग्रहण नहीं कर सकता।
इसपर राजा ने अपने प्रिय पुत्र चिन्मयदेव का मांस अतिथि को प्रदान किया लेकिन उसने बालक का सिर नहीं दिया। जिसे राजा यह सोचकर रख लिया था कि बाद में अपने पुत्र की कपाल क्रिया कर देंगे ताकि पुत्र की आत्मा को मुक्ति मिल सके। मगर अतिथि ने यह कहकर मांस खाने से इंकार कर दिया कि जो हिस्सा आपने छुपा लिया है वह मष्तिष्क वाला भाग ही खाएंगे।
इस पर राजा श्रीपाल और रानी कान्ति देवी ने मिलकर अपने पुत्र का सर बड़े दुखी मन से ओखली में कूटकर मस्तिष्क के भाग को अतिथि को प्रस्तुत किया। राजा के अतिथि सत्कार से प्रसन्न होकर भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरुप में आ गए। और राजा के पुत्र चिन्मयदेव को जीवित कर दिया और राजा श्रीपाल को वरदान भी दिया। कहा जाता है की राजा के अपने पुत्र के सिर को ओखली में कूटने के कारण इस गांव का नाम ओखला और भगवान शिव के मंदिर को ओखलेश्वर महादेव (Akhileshwar Tample khargon) के नाम से जाना जाने लगा।
कैसे पहुचें ?
उपरोक्त शिव और हनुमान मंदिर की कथा बहुत ही रोचक है। Akhileshwar Tample khargon लोग दूर दूर से दर्शन करने आते है और उनकी मान्यता पूर्ण होती है। निकटतम हवाई अड्डा इंदौर का अहिल्याबाई एयरपोर्ट है, जहा से यहां निजी वाहन के द्वारा पहुंचा जा सकता है। सवारी वाहन की व्यवस्था अभी उपलब्ध नहीं है। इंदौर खंडवा मार्ग से 18 किमी बड़वाह, बड़वाह से 31 किमी पक्का सड़क मार्ग से ओखला के ओखलेश्वर पंहुचा जा सकता है।