देव उठानी एकादशी: एक पौराणिक पर्व और आदि कथा
1. देव उठानी एकादशी और उसका महत्व :
देव उठानी एकादशी सनातन हिन्दू समाज में महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ धार्मिक पर्व हैं। इस विशेष दिन को आपसी प्रेम और भक्ति के साथ मनाने का सशक्त कारण है। देव उठानी एकादशी एक अद्वितीय तिथि है कहा जाता है की आज के दिन भगवान विष्णु अपनी निद्रा त्यागकर सृष्टि के पालन में फिर से लग जाते हैं।
इस दिन देवता लोग भगवान विष्णु की पूजा आरती वंदन करते हैं, आम प्राणी भी आज भगवान श्री हरी की पूजा करके अपने जीवन में नई शक्ति को जगाने का संकल्प लेते हैं। तुलसी विवाह भी इसी दिन होता है, जिसे लोग भगवान विष्णु के साथ तुलसी के विवाह की कथा के रूप में मनाते हैं। और आज के दिन को हरिप्रबोधनी एकारसी (एकादशी) भी कहते है।
इस दिन देवता लोग भगवान विष्णु की पूजा आरती वंदन करते हैं, आम प्राणी भी आज भगवान श्री हरी की पूजा करके अपने जीवन में नई शक्ति को जगाने का संकल्प लेते हैं। तुलसी विवाह भी इसी दिन होता है, जिसे लोग भगवान विष्णु के साथ तुलसी के विवाह की कथा के रूप में मनाते हैं। और आज के दिन को हरिप्रबोधनी एकारसी (एकादशी) भी कहते है।
देव उठानी एकादशी :

कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को देव उठानी (देवउठनी) देवोत्थान, एकादशी, प्रबोधनी एकादशी जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्रीहरि विष्णु अपने चार माह की निद्रा से जागते है।इसी दिन चातुर्यमास पूरा हो जाता है। सनातन धर्म में प्रबोधनी एकादशी से सारे शुभ कार्य जैसे शादी विवाह आदि शुरू हो जाते हैं।
प्राचीन कथा के अनुसार देव उठानी एकादशी और उसका महत्व :
किसी राज्य में एक धर्मात्मा राजा रहता था जो भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था, राज्य की प्रजा भी भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थी राज्य की प्रजा धनधान्य से संपन्न रहती थी प्रजा पालक राजा अपनी प्रजा का अपने संतान जैसे पालन करता था। देव उठानी एकादशी के दिन उस राज्य में अन्न का वितरण नहीं होता था, न ही अन्न के बाजार लगते थे, राजा के साथ राज्य की प्रजा भी देव उठानी एकादशी के दिन केवल फल का सेवन करती थी।
एकबार भगवान विष्णु अपने राजा भक्त की परीक्षा लेने राजा की नगरी में एक सुन्दर स्त्री का रूप बनाकर राजा के आने वाले रास्ते में खड़ेहो गए। जब राजा निकला तो वह सुन्दर स्त्री को देखकर उससे बोले हे देवी तुम कौन हो ? इस तरह रास्ते में क्यों खड़ी हो। तब स्त्री बने भगवान कमलापति ने कहा, राजन मैं बेसहारा हूँ इस नगर में मेरा कोई नहीं है ऐसे में मेरी कौन सहायता करेगा। राजा उस स्त्री के रूप से पहले ही मोहित हो गया था। राजा ने कहा तुम चाहो तो मेरे महल में रह सकती हो और राजा ने उस स्त्री से विवाह का प्रस्ताव रखा।

सुंदरी बोली मैं तुम्हारी बात मान तो लूगी लेकिन आपको मेरी शर्त माननी पड़ेगी राज्य के विषय में आपको मेरी बात माननी पड़ेगी और मैं जो खाना बनाऊँ, जैसा बनाऊं आपको खाना पड़ेगा। राजा स्त्री के मोह में फस गया था इसलिए उसकी बात टाल न सका। दोनों का विवाह हुआ और स्त्री का वेश धारण किये हुए श्रीहरि राजा के महल आ गए।
अगले दिन देव उठानी एकादशी आयी उस दिन वह स्त्री राजा से बोली आज राज्य में अन्न के बाजार लगवाए जाएँ और महल में उसने माँसाहारी भोजन पकाया जब राजा को खाने के लिए बुलाया और राजा ने मांसाहारी भोजन देखा तो बोला आज देवउठानी एकादशी है में यह भोजन नहीं करूँगा मैं केवल फल का सेवन करूँगा।
तब रानी ने अपनी शर्त याद दिलाई और बोली है अगर आप भोजन नहीं करेंगे तो मैं आपके पुत्र का वध करवा दूंगी।
तब राजा अपनी बड़ी रानी को सारी बात बताइ तो बड़ी रानी ने कहा राजन,
दुनिया में एक धर्म ही है जो कभी नहीं छोडना चाहिए आप पुत्र का सिर दे दें लेकिन धर्म न छोड़ें, पुत्र दोबारा मिल जायेगा लेकिन यदि एक बार धर्म गया तो वह दोबारा नहीं मिलेगा, यह बात जब राजकुमार को पता लगी तो सहर्ष तैयार हो गया और अपने पिता के धर्म को बचाने के लिए अपने प्राणों के बलिदान को अपना धर्म माना। धर्म के प्रति अडिग राजा को देखकर भगवान विष्णु अपने वास्तविक रूप में आ गए और खुश होकर राजा से वरदान मांगने को कहा, राजा ने कहा प्रभु आपकी कृपा से मेरे पास सबकुछ है बस अपनी कृपा हमपर सदा बनाये रखें।
इस तरह धर्म पर अडिग रहकर राजा मोक्ष को प्राप्त किया, जो व्यक्ति अपने धर्म को नहीं छोड़ता उसकी सारा संसार पूजा करता है और उसका नाम सदैव के लिए अमर हो जाता है।
पूजा विधि:
देव उठानी एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर नित्यक्रिया से निवृत होकर स्नानादि करके साफ कपडे पहनने चाहिए और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए एकादशी व्रत का संकल्प लेना चाहिए। फिर अपने आस पास समाज में प्रचलित विधि से पूजा करना चाहिए या किसी योग्य व्यक्ति से पूजा विधि की जानकारी लेकर ही पूजा करनी चाहिए, सोशल मीडिया में प्रचलित विधि का प्रयोग न करे अपने बड़े बुजुर्गों का मार्गदर्शन लेकर ही पूजा विधि संपन्न करें।
देव उठानी एकादशी शुभयोग और मुहूर्त :
इसबार देव उठानी एकादशी 23 नवम्बर 2023 दिन गुरुवार को पड़ने की वजह से इसका महत्व बढ़ जाता है, क्योकि गुरुवार का दिन भगवान विष्णु का वार माना जाता है। देव उठानी एकादशी के दिन सर्वार्थ सिद्धियोग और रवि योग का शुभ संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार दोनों योग बहुत शुभ दायक हैं। जिसमे रवियोग 23 नवम्बर 2023 को सुबह 06:49 मिनट से शाम 05:16 मिनट तक रहेगा और सर्वार्थ सिद्धियोग शाम 05:16 मिनट से 24 नवम्बर 2023 को सुबह 06:50 मिनट तक रहेगा। एकादशी तिथि 22 नवम्बर २०२३ को शुबह 11:03 से शुरू होकर 23 नवम्बर 2023 को रात 9:00 बजे समाप्त होगी।